संस्था की स्थापना एवं उद्देश्य

संस्था के उदेश्य विधान एवं नियमावली
विधान समिती
संस्था के उदेश्य विधान एवं नियमावली हेतु निम्न छह सदस्यीय विधान समीति का गठन किया गया।

  1. श्री छबीलदास शाह, हैदराबाद
  2. श्री व्ही जी पारेख, मुम्बई
  3. श्री मदनदास दोशी, अहमदनगर
  4. डॉ. जी डी नागर, इन्दौर
  5. श्री प्रमोद नागर , इन्दौर
  6. श्री श्री गिरधरगोपाल नागर, इन्दौर

प्रथम कार्यकारिणी
अध्यक्ष - डॉ. जी डी नागर, इन्दौर
उपाध्यक्ष - 1. श्री रमणलाल पारेख, मुम्बई 2. श्री हरिदास श्राफ , पूणे 3. श्री मदनदास दोशी, अहमदनगर
सचिव - श्री प्रमोद नागर , इन्दौर
सह सचिव - 1. श्री अशोक पारिख, नाथद्वारा 2. श्री टीकमदास गुजराथी , अहमदनगर 3. श्री रमेश पारिख , मुम्बई
कोषाध्यक्ष - श्री विलदास नागर , इन्दौर
सह कोषाध्यक्ष - श्री दामोदरदास श्राफ, बुरहानपुर
कार्यकारिणी के सदस्यों में से एक परामर्श समिती का मनोनयन किया गया। जो निम्नानुसार है।
श्री रामदास शाह, अहमदनगर श्री छबीलदास शाह, हैदराबाद श्री व्ही जी पारेख, मुम्बई श्री रतनलाल पारिख , नाथद्वारा श्री चिमनलाल गुजराथी ,पूणे श्री हरिदास पारेख , बांसवाडा
उपरोक्त समिती संस्था के निती निर्धारण में परामर्शदाता के रूप में कार्य करेंगी।
संस्था के उददेश्य एवं नियमावली निम्न सदस्यों द्वारा विभिन्न नगरों मे जाकर वहॉ के स्थानीय समाज के प्रतिनिधियों से विचार विमर्श कर 2 वर्ष में बनाई गई ।
उददेश्य एवं सदस्यता नियमावली
1. संस्था का नाम - अखिल भारतीय श्री विशा नागर वणिक समाज होगा।
2. संस्था का कार्यालय - 7, छ्रत्रपति नगर, इन्दौर तहसील इन्दौर जिला इन्दौर म. प्र.
3. संस्था का कार्यक्षेत्र संपूर्ण भारत होगा।
4. संस्था के उददेश्य निम्निलिखत होंगें –

अ) समस्त नगरो मे स्थित समाज के मुख्य स्थानीय समाज को संस्था से जोडना एवं अखिल भारतीय स्तर पर एक मजबूत एवं लोकतांति्रक संगठन बनाना।
आ) समस्त जाति बंधधुओ मे एक्य भाव का प्रचार करना।
इ) समाज के मुख्य रीती रिवाजो मे एक रूपता लाने, सामुिहक लग्न, एवं परिचय सम्मेलन कराने एवं खर्चो को कम करने मे सहयोग करना।
ई) समाज के बंधुओ को तन मन धन से यथा संभव मदद करना।
उ) समाज के असहाय बंधुओ एवं मिहलाओ की यथा संभव मदद करना।
ए) समाज के सदस्यो के िलए रोजगार के अवसर एवं उनकी आरि्थक उन्नति हेतु मदद करना।
ओ) समाज के सदस्यो मे स्वास्थ सेवा का विस्तार करना एवं जरूरतमंद को आकिस्मक िचकित्तसा सेव मे सहायता करना।
क) समाज मे सामािजक शिक्षण एवं अच्छे संस्कारो का प्रचार करना।
ख) समाज के छात्र छात्राओ को आधुनिक शिक्षण की ओर प्रेरित कर उत्त्सािहत करना।
ग ) समाज के जरूरतमंद छात्र छात्राओ को उच्च शिक्षा हेतु आरि्थक सहायता प्रदान् करना विना किसी जाति भेदभाव के।
च) समाज मे सेवा एवं सर्मपण की भावना के साथ जाति बंधुओ का सामिजक , बौकि एवं नैतिक स्त्तरचा करना।
छ) समाज की बािलकाओ एवं मिहलाओ को हस्तकला, शिल्पकला, गृह उद्योग हेतु प्रोत्त्साहन देना एवं यथा संभव मदद करना।
ज) समाज के सदस्यो के व्यिक्तत्व विकास हेतु पत्र पति्रकाए निकलवाना एवं अन्य कार्य करना।
झ) समाज के प्रतिभाशाली लोगो का उिचत सम्मान करना एवं प्रोत्त्साहन देना।
थ) संस्था एवं समाज के िहत मे कोई कार्य करना।
द) संस्था द्वारा चल अचल संपित्त खरिदना, या दान के रूप मे प्राप्त चल अचल संपित्त का संरक्षण करना।

5. सदस्यता
अ) प्रत्येक नगर का श्री विशा नागर विणक समाज का स्थानीय समाज (जो समाज के ज्यादा से ज्यादा जाती बंधुओं का प्रतिनिधित्व करती हो ) वो आजीवन सदस्य बन सकेगा।
आ) स्थानीय समाज का आजीवन सदस्यता शुल्क रू 501 रहेगा।
इ) प्रत्येक सदस्य ( स्थानीय समाज) अपने सदस्यो के अनुपात से प्र्रत्येक 10 परविार या 50 सदस्यो पर 1 प्रतिनिधी ( िजसमे संस्था के अध्यक्ष एवं मं्रत्री उसी समय्पद पर होगें अनिवार्य रूप से शामिल रहेगें ( एवं 25 परविार या 125 सदस्यो पर 1 मिहला प्रतिनिधी) कम से कम दो ( अपनी कार्यकारिणी की आज्ञा से मनोनित करके भजेगी प्रतिनिधीयों का कार्यकाल 3 वर्ष का रहेगा।
ई) संरक्षक सदस्य श्री विशा नागर विणक समाज का प्रत्त्येक पुरूष् एवं मिहला िजसकी आयु 18 वर्ष से अधिक है साधारण सभा का आजीवन सदस्य रहेगा।
उ) संस्था का संरक्षक सदस्यता शुल्क 5001 रहेगा।
क) निम्निलिखत अवस्था मे सदस्यता समाप्त करना। यिद कोई सदस्य (संरक्षक या स्थानीय समाज) ऐसा कार्य करता पाया गया िजसमें संस्था को किसी भी तरह की हानि पहुॅचती हो या हानि पहुॅचने की संभावना हो तो साधारण सभा प्रस्ताव पास करके उसे पृथक कर सकती है। निष्कािसत सदस्य यिद संस्था की सदस्यता पुन प्राप्त करना चाहता हो तो साधारण सभा की स्वीकृती आवश्यक होगी एवं उसे आजीवन सदस्य शुल्क िफर से जमा कराना होगा।
ख) प्रत्येक सदस्य (स्थानीय समाज के प्रतिनिधि एवं संरक्षक सदस्य) को किसी भी विषय पर मत देने का अधिकार रहेगा।

6. साधारण सभा
क) संस्था के कार्यो को सुचारू रूप से चलाने के िलए साधारण सभा नियमानुसार तीस सदस्यो का निर्वाचन करेगी एवं ग्यारह सदस्यों की नामजदगी करेगी। अध्यक्ष एवं सिचव कार्यकारिणी की सलाह से संरक्षक सदस्यो मे से ही करेगे। नामजदगी की पात्रता उन्ही सदस्यो को रहेगी जो तत्कालीन कार्यकारिणी चुनाव मे असफल न हुए हों। समिति के कुल 41 सदस्य रहेगें। कार्यकारिण् का कार्यकाल 3 वर्ष का रहेगा।
ख) अध्यक्ष एवं सिचव का चुनाव 30 निर्वाचन सदस्यो मे से ही निर्वािचत सदस्यो द्वारा गुप्त मतदान से किया जावेगा।
ग) नव निर्वािचत अध्यक्ष, सिचव की सलाह से शेष पदाधिकारियो एवं सदस्यो के नामों की घोषणा निर्वािचत एवं मनोनित सदस्यो मे से करेगें। समिति मे निम्न पदाधिकारी होगे।
1) अध्यक्ष 1 पद 2) उपाध्यक्ष 3 पद 3) सिचव 1 पद
4) सहसिचव 3 पद 5) कोषाध्यकक्ष 1 पद 6) सह कोषाध्यकक्ष 1 पद
7) सदस्य 31 पद

7 निर्वाचन (चुनाव)
संस्था की कार्यकारिणी समिति के आधे सदस्यो ( एक बार 15 एवं दूसरी बार 15 सदस्यो (प्रथम बार डा द्वारा) का चुनाव प्रति 3 वर्ष मे साधारण सभा की बैठक मे उपिस्थत सदस्यो द्वारा वारि्षक अधिवेशन के पूवे गुप्त मतदान द्वारा निर्वाचन अधिकारी के निर्देशन में सम्पन्न होगा।
निर्वाचन तििथ के 45 िदन पूर्व नियोजन पत्र सदस्यो के पास पहुॅचा िदए जावेगे एवं चुनाव मे भाग लेने वाल्े उम्मीदवार को अपना नियोजन पत्र 20 िदन के पूर्व निर्वाचन अधिकारी के पास पहुॅचाना होगा। प्रत्येक उम्मीदवार के नामांकन पत्र दोे साधारण सभा के सदस्यो द्वारा समरि्थत होना चािहए। यिद उम्मीदवार अपना नाम वापस लेना चाहे तेा निवार्चन समय के 10 िदन पूर्व िलिखत सूचना निर्वाचन अधिकारी को देना होगी।
जस क्षैत्र का कार्यकारिणी सदस्य का पद किसी भी कारण से रिक्त है तो वह पद उस क्षैत्र से पुन भरा जावेगा।
प्रत्येक शहर की स्थानीय संस्थाओ ( िजसमें संस्था की आजीवन सदस्यता ग्रहण की है) में से प्रति सात प्रतिनिधियो (पॉच पुरूष तथा दो मिहला) पर एक प्रतिनिधि को चुनाव में भाग लेने की पात्रता रहेगी। िजस स्थानीय संस्था में सात प्रतिनिधि से कम प्रतिनिधि होंगे वहॉ से एक प्रतिनिधि को चुनाव मे भाग् लेने की पात्रता रहेगी।
संरक्षक सदस्यों को चुनाव मे भाग लेने की पात्रता रहेगी।
यिद नियोजन पत्र कार्यकारिणी को सदस्य संख्या से कम भरे गये, तब वैध नियोजन पत्र के उम्मीदवार को तो निर्वािचत माना जावेगा एवं शेष संख्या की पूरि्त साधारण सभा में उपिस्थत सदस्यो मे से निर्वाचन द्वारा करेगी।
कार्यकारिणी की निशि्चत सदस्य संख्या के बराबर वैध नि योजन पत्र भरे गए हो उन सभी उम्मीदवारो को निर्वािचत माना जावेगा।समस्त सदस्यो को चुनाव मतदान के अवसर पर मतपत्र में 15 उम्मीदवारो को मत देना अनिर्वाय रहेगा। कम या ज्यादा होने पर मतपत्र अवैध होगा।
निर्वाचन के अवसर पर उतपन्न विषय पर नियमावली मे को कोई स्पष्ट निर्देश न होने की िस्थती मे निर्वाचन अधिकारी द्वारा अपने विवेक से िलया गया निर्णय अनि्तम होगा
कार्यकारिणी समिति मे कोई भी सदस्य 1 पद पर 2 कार्यकाल (6 वर्ष) से ज्यादा नहीं रहेगा।
परामर्श समिति वरिष्ठ सदस्यो की परामर्श समिति रहेगी । परामर्श समिति क्षैत्र अनुसार 11 सदस्यो की रहेगी। िजनका कार्यकारिणी समिति द्वारा मनोनयन होगा जो कार्यकारिणी के सदस्य मे से ही िलए जायेगे।
परामर्श समिति के सदस्य कार्यकारिणी को निती नि्र्धारण मे सलाह देगेंं।
निर्वाचन अधिकारी
1 निर्वाचन अधिकारी की नियुकि्त समिति द्वारा की जावेगी।
2 संस्था के नियम उपनियम अनुसार निर्वाचन कराना।
3 निर्वाचन के अवसर पर उत्पन्न विषय में नियमावली में कोई स्पष्ट निर्देश न होने की िस्थति में निर्वाचन अधि्कारी द्वारा अपने विवेक से िलया गया निर्णय अनि्तम होगा।

नागर मूल की उत्पत्ति

नगरं नगरं चैतच्छत्वा कार्य पत्रगाधमा
तत्र स्यास्यन्ति ते बैध्य भविष्यति यथा सु

नागर मूल कहॉ से आए इस बारे में कई मतान्तर हैं एक तथ्य यह है कि सरस्वती नदी के किनारे वन प्रदेश में 84 गौत्र के ब्राम्हण अपने कुटुम्ब सहित रहते थे इन ब्राम्हणों का रहन सहन देख कर वहॉ के राजा जिनका नाम चमत्कार था ब्राम्हणों के लिए प्रसन्नतापूर्वक एक नगर का निर्माण कर उन्हें बसाया यह गॉव पहले चमत्कार कहलाया एवं बाद में उसका नाम बडनगर पड गया एवं नगर में निवास करने वालो को शने शने नागर नाम से जाना गया नागर जाति के लोग विगत मे धर्मशास्त्र एवं कर्मकाण्ड के पंडित थे उनकी बुद्धि कार्यकुशलता प्रतिभा एवं विद्वता के कारण उन्होने राज्य तंत्र में भी प्रवेश किया एवं अच्छे पदों पर पहुचे शिक्षा में भी नागर बंधु एवं महिला अग्रणी है सांसारिक व्यवहार विवाह आदि मे स्वर्ण का महत्व नहीं था कंकू एवं कन्या यही नागर समाज की रीति वर्षो से चलन में है मेहसाणा जिले के बडनगर में नागरों के कुलदेवता श्री हाटकेश्वर महादेव का एक सुंदर मंदिर विद्यमान है
कुल देवता श्री हाटकेश्वर महादेव

श्री हाटकेश्वर विजयते
श्री हाटकेश्वर महादेव की उत्पत्ति कथा
कुल देवता नागर समाज श्री हाटकेश्वर महादेव

मर्यार्हाघंत्दिलिडग हाटकेनविनिर्मितम
ख्यार्तियास्यति सर्वत्रपाताले हाटकेश्वरम


अति प्राचीन समय की बात है आनर्त प्रदेश अर्थात द्वारका के पास में सर्वरूपेण सम्पन्न वन प्रदेश में ऋषि मुनि अपने गृहस्थ धर्म के साथ अपनी पर्णकुटियां बनाकर रहते थे और नित्य वैदिक धर्म का पालन कर यज्ञयादगिक क्रियाओं, वेदो का अभ्यास वैसे ही वेदोपनषि्द के घोष् द्वारा तथा प्रभु प्रीत्यर्थ अनेक तरह की तपश्चर्या के प्रयोग, अग्निहोत्र अग्निषेम आदि याज्ञकी क्रियाए कर वनवास में योग्य फलाहार कर, अपना समय व्यतीत करते थे। उसी समय की बात है कि सती वियोग से व्यथित कैलाशपति शंकर नग्नावस्था मे घूमते फिरते उसी आनर्त प्रदेश में आ पहुचे।
भगवान शंकर की स्वर्ण सद्दश तथा तेजपुंजयुक्त काया को देख ऋषि मुनियों की पत्नियो की बुद्धि कामवि्हल हो गई और सारा काम धंधा भूलकर शंकर को देखने लगी। अपनी पत्नियो की यह स्थिती देख ऋषि मुनि अत्यंत खिन्न हो उठे और क्रोधावश मे सदाशिव शंकर को श्राप दिया कि तुमने हमारे आश्रम को दूषित किया है, इसीलिए यह लिंग पृथ्वी पर शीघ्र ही गिर पडेगा।
देखते ही देखते शंकर का लिंग पृथ्वी पर और उसी वक्त लिंग धरातल को फाडकर पाताल मे जा बसा। कैलाशपति सदाशिव शंकर को इससे खेद हुआ और लज्जावश उसी क्षण से गुप्त वास करने लगे।
भगवान शंकर को गुप्त वास करने के साथ ही पृथ्वी पर अनेक उपद्रव, उत्पात तथा कष्ठ शूरू हो गये । यह सब देख ऋषि मुनि तथा पृथ्वीवासी भयभीत हो उठे। ऐसा लगने लगा की प्रलय आ गया हो। सभी ऋषि मुनि एवं देवतागण ब्रम्हाजी के पास पहूचे और उनकी स्तुती की , उन्हे प्रसन्न किया और पृथ्वी पर हो रहे उत्पादो का कारण पूछा।
ब्रम्हाजी समाधिस्थ हुए एवं उस उत्पाद का कारण जाना और मुनियो से कहा कि यह प्रलय का लक्षण नही है बल्कि ऋषियों के श्राप से सदाशिव शंकर का लिंग गिर पडने से उत्पन्न हुई उनकी अस्थित तथा शोकमग्न दशा के कारण ही यह सब हो रहा है। फिर ब्रम्हाजी ने स्वयं सारे देवताओ मुनियों के साथ श्री विष्णु भगवान की स्तुति की और विष्णु सहित सारे मुनि देवता तथा ब्रम्हा आनर्त प्रदेश में पहूचे। सभी ने सदाशिव शंकर की स्तुति की। वंदना कर उन्हें प्रसन्न करने का उपाय शुरू किया और जब शंकर प्रसन्न हुए तब उन्हें संसार के दुख तथा उत्पादों का स्मरण दिलाया।
कैलाशपति सदाशिव शंकर ने कहा सती के वियोग से मुझे अत्यंत क्लेश पहूचा एवं इसी वजह से इस लिंग का स्थान भ्रष्ट करने की मेरी इच्छा हुई थी और मैं दिग्मबर वेश में वन उपवन में फिरता हुआ इस आनर्त प्रदेश पहुंचा तथा यहां मुनियों तथा ऋषियों के श्राप के कारण ही मैने इस लिंग का त्याग किया है।
सदाशिव शंकर की यह बात सुनकर ब्राम्हण विष्णु तथा अन्य देवताओ ने उनसे विनय के साथ कहा कि आप सती के लिए शोक न करें हिमालय में मेनका के यहॉ पार्वती का जन्म होगा और वह पार्वती ही आपकी सती है जिसे आप ग्रहण कर प्रसन्न होंगे। इसिलए आप इस लिंग का पूर्ववत धारण कर लें।
शंकर ने लिंग धारण करने के पूर्व देवताओं से कहा कि यदि आज से ब्राम्ह्ण लोग विधिपूर्वक लिंग का पूजन करेंगें तभी मैं इसे धारण करूंगा । अत स्वयं ब्राम्हणौ ने कहा हम भी आपके लिंग की पूजा कर सूखी प्रसन्न होंगें। वैसे आपके लिंग की संसार में पूजा होगी और पृथ्वीवासी आपके लिंग की पूजा कर अपना जीवनयापन कर प्रसन्नता को प्राप्त होंगें। तब प्रसन्न होकर शंकर ने पुन लिंग धारण कर लिया और ब्राम्हणौ विष्णु तथा अन्य देवताओ ने हाटक यानी सोने का लिंग बनाकर पाताल में उसी स्थान पर उसकी स्थापाना कर शास्त्र विधि पूर्वक उसकी पूजा अर्चना कर शंकर को प्रसन्न किया तथा पृथ्वी पर श्री महादेवजी की लिंग पूजा का माहात्यम बढाकर वर्तमान संकट का निवारण किया। फिर ब्राम्हणौ विष्णु तथा अन्य देवता अपने अपने लोग में चले गए।
तभी से शिवलिंग का माहात्म्य संसार में बढ गया और पृथ्वी का उत्पाद शांत हो गया। जिस लिंग का ब्रम्हाजी ने स्थापना किया यह श्री हाटकेश्वर महादेव के नाम से प्रसिद्ध हुआ और नागरों के कुल देवता माने गए। तभी से नागर बंधु दशा विशा दशोरा विणक ब्राम्हणौ चैत्र 14 को हाटकेश्वर महादेव की पूजा अर्चना करते है पालकी निकाली जाती और आरती कर प्रसाद ग्रहण किया जाता है।

Welcome

किसी भी राष्ट्र के उत्थान में वहॉ के नागरिकों एवं उनके संगठनो का महत्वपूर्ण योगदान होता है। एक अच्छे राष्ट्र के निर्माण मे सहभागिता तभी संभव है जब वहॉ के नागरिक सुशिक्षित, संगठित एवं संस्कृत हो । जिस प्रकार अथाह समुद्र मे अशुण जल कण होते है किन्तु उनमें से कुच्छेक जल् कण ही सीप में समाकर मोती का रूप धारण करते है ठीक उसी प्रकार भारत वर्ष रूपी जल समुद्र में श्री जी कृपा से श्री विशा नागर समाज रूपी जल कण सेवा संस्कार सहकार एवं संगठन रूपी सीप में समाकर अखिल भारतीय श्री विशा नागर समाज रूपी अमुल्य मोती का रूप धारणकर आज अपनी आभा प्रकट कर रहा है ।
आज के इस युग में अर्थ के मुल्य के साथ साथ समय का मुल्य भी कम नहीं है इस संस्था के निर्माण में प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से कई ज्ञाति बंधुओं ने कठिन परिश्रम किया है एवं कर्मठ कार्यकर्ताओं ने इस कल्प वृक्ष को अपने अपने माध्यम से सिंचा है, और आज यह विशाल वट वृक्ष का रूप लेकर आपके सम्मुख है। संस्था द्वारा वर्तमान मे संचालित स्थाई सेवा कोष हेतु आप सभी अपने सामर्थ अनुसार श्रद्धा निधी के साथ साथ तन मन एवं धन से सहयोग करें। वर्तमान में इस कोष के माध्यम से हम उन ज्ञाति बंधुओं की सेवा कर रहें जो धन के अभाव मे रोगों का उपचार नही करवा सकतें है तथा भविष्य मे इसी के माध्यम से शिक्षा व आर्थिक सहायोग भी प्रदान करने जा रहे है। यहॉ यह उल्लेखनीय है कि यह सहयोग ठीक वैसे ही देना है, जैसे भगवान श्री कृष्ण ने सुदाम़ा को सहयोग दिया था , अर्थात हम सहयोग तो देवे पर लेने वालों को मालूम ही न पडे कि किसने सहयोग दिया। तब ही दुख मे दर्द न होने की अखिल भारतीय विशा नागर समाज की मूल भावना सार्थक होगी। समाज का कोई भी व्यक्ति जो आर्थिक रूप से अक्षम है कृपया उसकी आर्थिक उन्नति हेतु सहयोग करें।
हमारे समाज मे प्रतिभाओ की कमी नही है, मात्र उन्हें प्रोत्हासन देने की आवश्यकता है, और पर्याप्त फलने फूलने हेतु उन्हें स्थानीय स्तर पर मंडल, पंचायत, समितिया आदि के माध्यम से सहयोग किया जावें। स्थानीय संस्थाए मजबूत होगी तभी यह सुदृड बनगी। नागर समाज के व्यक्ति हजारों काच के टुकडों में अलग ही हीरे के समान चमकते है। हम अपनी पहचान अपने आराध्य प्रभु श्रीनाथजी की कृपा से ही बना पाए है। धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्कार अपनी भावी पीडी में भी डालना है, क्योंकि संस्कारवान बालकों से ही सुसंस्कारित समाज का निर्माण किया जा सकता है। अत प्रत्येक नगर के बालक बाकलिकाओं हेतु वहॉ की स्थानीय मंडल या पंचायत द्वारा धार्मिक शिक्षण की व्यवस्था की जावें, चाहे वह दैनिक न हो सके तो साप्ताहिक हो। इन्दौर से नागर बंधु का त्रैमासिक अंक का प्रकाशन इस उद्देश्य के साथ किया जा रहा है कि विभिन्न नगरों की गतिविधिया व अच्छी बातों को अपने यहॉ भी क्रियांवित किया जा सके।

अध्यक्ष
श्री पी डी नागर इन्दौर


About Akhil Bhartiya

प्रथम महाधिवेशन

विभिन्न नगरों के ज्ञाति बंधुओं को एक दूसरे के नजदीक लाने के एवं अखिल भारतीय स्तर पर विशा नागर समाज का एक मजबूत संगठन के उद्दोश्य से श्री नाथ धाम नाथद्वारा में संस्था का प्रथम महाधिवेशन दि. 26–27 सितम्बर 1998 को आयोजित किया गया। जिसमें मुख्य अतिथि समाज सेवी श्री मदनलाल नागर, इन्दौर एव् विशेष अतिथि स्व. श्री बाबूभाई पारेख, मुम्बई एवं स्व. श्री विठलदास जव्हेरी, हैदराबाद थे। विभिन्न नगरों से करीब 1600 से ज्यादा ज्ञाति बन्धुओं ने भाग लिया। पू. गो. 108 श्री वागीश कुमार महाराज श्री के वचनामृत हुए इसके पश्चात नाथद्वारा , उदयपुर, मंदसौर , इन्दौर , हैदराबाद, मुंबई के बालक – बालिकाओं द्वारा मनमोहक सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए। श्रीनाथजी के मंदिर की ऐतिहासिक परिक्रमा बैड बाजों के साथ शूरू हुई सभी पुरूष सफेद वस्त्र एवं केशरिया दुपे ओढे एवं महिलाए केशरिया साडी पहने लयब्ध भजन गाते हुए दो घंटे मे परिक्रमा पूरी की। नाथद्वारा के इतिहास मे इतने सारे वैष्णवों ने मंदिर परिक्रमा एक साथ प्रथम बार की। परिक्रमा का डृश्य अलौकिक था।

मुख्य अतिथियों द्वारा प्रथम मिलन स्मारिका का विमोचन किया गया। स्मारिका मे विभिन्न शहरों की स्थानीय संस्थाओं की जानकारी, कुंवारे लडके लडकीयों की सूची , लेख एवं टेलीफोन डायरेक्टरी का प्रकाशन किया गया था। श्री गिरधरगोपाल नागर सम्पादक एवं भूपेन्द्र मिणहार उपसम्पादक थे।

प्रथम परिचय सम्मेलन

परिचय सम्मेलन की प्रथम पायदान के रूप में दिनांक 10–10–1999 को विशा नागर महाजन वाडी पूना में कार्यकारिणी सदस्य, पदाधिकारी एवं समाज के जाति बंधुओ की उपिस्थति में प्रथम परिचय पत्रिका का महिमापूर्ण वातावरण में विमोचन किया गया। इस पत्रिका में 350 विवाह योग्य कंुवारे लडके लडकियों का विवरण मय छायाचित्र के प्रकाशित किए गए थे, जिसमें उत्तम चयन के साथ – साथ पालकों के समय एवं अर्थ की बचत हुई। संस्था का यह एक सार्थक प्रयास था एवं जाति बंधुओं ने पित्रका में अपने बच्चों के फोटों एवं विवरण भेजकर संस्था के प्रति अपना अपार विश्वास प्रकट किया।

समूह लग्न

परिचय पत्रिका की सफलता से उत्साहित होकर दिनांक 2–12–2000 को उपाध्यक्ष श्री रमणभाई पारेख (संयोजक) के नेतृत्व में सामूहिक विवाह का नाथद्वारा में भव्य आयोजन किया गया, जिसमें प्रत्येक वर वधू से रू. 5–5 हजार प्रवेश राशी ली गई थी। श्री नाथद्वारा में दिनांक 2–12–2000 को विभिन्न नगरों के 11 वर एवं 11 वधू विवाह सूत्र में बंधे अ. भा. सामूहिक विवाह समिती द्वारा विवाह में आए सभी अतिथियों के ठहरने. औढने. बिछाने. भोजन. नाश्ते आदि की समूचित एवं सुचारू व्यवस्था नाथद्वारा की विभिन्न धर्मशालाओं व कॉटेज में की गई थी। प्रभु श्रीनाथजी की कृपा से सारे कार्यक्रम निर्विघ्न सम्पन्न हुए जो अ. भा. संस्था के लिए मील का पत्थर साबित हुआ। इस कार्यक्रम की सभी ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की।

द्वितीय महाधिवेशन

अ.भा. संस्था ने आठ वर्षो में 'प्रथम महाधिवेशन', 'परिचय्', फिर 'समूह लग्न' तत्पशात दिनांक 27–1–2002 को चयनिका कुंवारे लडके एवं लडकियों की जानकारी की दूसरी पत्रिका का विमोचन समारोह नासिक के जातिजनों की उपिस्थति में माननीय श्री रामदास शाह अहमदनगर, श्री हिरालालजी पारीख नासिक एवं श्री गोर्वधनदासजी सुगंधी नासिक के कर कमलों से सम्पन्न हुआ। दिनांक 11 व 12 जनवरी 2003 को द्वितीय महाधिवेशन का इन्दौर मे सभी को अम्रत पान कराया है । इसमे 1100 लोगो ने भाग लिया। इस अवसर पर प्रकाशित स्मारिका 'मधुर मिलन' का विमोचन किया गया । तथा 2004 में 'मनभावन' पत्रिका का प्रकाशन किया गया ।

तृ्तीय महाधिवेशन : 2009

अखिल भारतीय श्री विशा नागर वणिक समाज द्वारा दिनांक 3 व 4 जनवरी 2009 को बुरहानपुर में महाधिवेशन का आयोजन किया गया । तृ्तीय अधिवेशन का आयोजन अपने आप मे संस्था की सफलता व विकास यात्रा का घोतक है ।

Secretary

Shri Pramod Nagar

Website Committee

प्रमोद नागर : 9893043340
प्रबोध पारेख : 9425327542
नीलेश नागर : 9893025900
वेबसाइट डेवलपर : Dr. चेतन नागर, नागर सॉफ्टवेयर, Mob. No. 9893246374

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